समाज तय करें विकास के मानक और प्रारूप

भारत की आबादी का साठ प्रतिशत 35 वर्ष से कम आयु के है। मानव संसाधनों की इस तरह की संभावना दुनिया में कोई अन्य देश नहीं है लेकिन हमारे पास आवश्यकता के आधार पर कोई विकास के मॉडल नहीं है। हमारे पास एक शानदार अवसर है कि हम भारतीय युवाओं की ताकत के साथ दुनिया का नेतृत्व कर सकते हैं। भारत की बुनियाद सामाजिक न्याय पर टिकी है, जहां कानूनी तौर पर न्याय से ज्यादा आर्थिक और सामाजिक न्याय महत्त्वपूर्ण हैं। किसी भी समाज में सौहार्द का माहौल इससे तय…

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देश की एकता के सूत्रधार, आधुनिक भारत के निर्माता

वर्ष 1947 के पहले छह महीने भारत के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण रहे थे। साम्राज्यवादी शासन के साथ-साथ भारत का विभाजन भी अपने अंतिम चरण में पहुंच गया था। हालांकि, उस समय यह तस्वीर पूरी तरह से साफ नहीं थी कि क्या देश का एक से अधिक बार विभाजन होगा। कीमतें आसमान पर पहुंच गई थीं, खाद्य पदार्थों की कमी आम बात हो गई थी, लेकिन इन बातों से परे सबसे बड़ी चिंता भारत की एकता को लेकर नजर आ रही थी, जो खतरे में थी। इस पृष्ठभूमि में ‘गृह…

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पेट्रोलियम कीमतों पर कब जिम्मेदारी लेगी सरकार?

भारत में ईंधन की कीमते किसी भी सरकार का काफी महत्वपूर्ण एवं जटिल विषय है, क्योंकि यह कीमते अधिकांश लोगों और हमारे समाज के हर वर्ग से जुड़ा हुआ मुद्दा है। सरकार और विपक्ष के बीच ईंधन की कीमतों को लेकर दोषारोपण का दौर शुरू हो जाता है, जब ईंधन की कीमते बढ़ती है तब कोई सरकार इसकी जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं होती | पहली नजर में यह बात सही लगती है और देश-दुनिया की हर बात के लिए सरकार को दोष देना सही नहीं है। लेकिन पेट्रोल-डीजल के दाम…

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प्रकृति के अप्राकृतिक दोहन से आपदा को आमंत्रण

प्राकृतिक प्रवाह नदी का अधिकार है, पर आजकल नदियों को केवल अन्न और विद्युत उत्पादन का साधन मान लिया गया है। विकास की शातिर भाषा में बांधों को बाढ़ रोकने वाला भी बताया जाता है। प्रकृति के अप्राकृतिक दोहन से हम आपदाओं को आमंत्रण दे रहे है | हम चाहे जितनी भी सावधानी बरतें, हर 50 या 100 सालों में बाढ़ जैसी आपदा आ ही जाती है। हमारा रवैया कुछ ऐसा है कि एक बार बाढ़ खत्म हो जाए, फिर हर मुमकिन समाधान के बारे में सोचा जाएगा। इतना सब होने…

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क्यों न मतदाता पहचान पत्र को आधार से जोड़ दिया जाये ?

Why Not We Link Voter’s ID Cards with Aadhaar?

क्यों नहीं इस देश में  राजनैतिक सुधारो के लिए मतदाता पहचान पत्रों को आधार से जोड़ दिया जाए जिससे इसका दुरूपयोग रोका जा सके | इससे देश में फर्जी वोटर सवतः ख़त्म हो जायेंगे और आधार की तरह मतदाता पहचान पत्र भी सभी के पास एक ही होगा | भारत की ज्यदातर समस्याओ का एक ही कारण है वो है राजनीती ! क्यूंकि देश में सभी विक्रतियो की पीछे कही न कही राजनीती जरुर जुडी होती है | हमारे देश में राजनीती से समाज बहुत हद तक प्रभावित होता है…

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आश्रय स्थलों में ये कैसा आसरा ?

Shelter Home

आप उन पढ़े लिखे और तथाकथित सभ्य सफेदपोशों के लिए क्या कहना चाहेंगे जिन्होंने मुजफ्फरपुर में 40 नाबालिग और बेसहारा लड़कियों के साथ उस छोटी और मासूम उम्र में दरिंदगी की सभी हदें पार कर दीं? ये कैसी तरक्की है यह कैसा विकास है जहाँ इंसानियत हो रही हर घड़ी शर्मसार है,? ये कैसा दौर है ये कैसा शहर है जहाँ बेटियों पर भी बुरी नजर है? ये कौन सी सभ्यता है ये कौन सी संस्कृति है कि जहाँ एक पुरूष का मानव शरीर में जन्म लेना मात्र ही मानव…

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ऐसी थी वाजपेयी जी की ‘अटल प्रेम कहानी’

वह विश्वमंच से दुनिया को भारत के स्वाभिमान का अंदाजा भी करा देते थे तो संसद में विपक्ष के नेता होने के बावजूद इंदिरा गांधी का यशगान करने से पीछे नहीं हटते थे। वह वोट खरीदकर बनने वाली सरकार को चीमटे से छूना भी पसंद नहीं करते थे, दूसरी ओर अगर कोई पत्रकार उनकी शादी पर सवाल पूछ ले तो वह मुस्कुराते हुए बस इतना कहते थे, ‘मैं अविवाहित हूं, कुंवारा नहीं।’ 16 अगस्त को भारतीय राजनीति का वह युग समाप्त हो गया, जिसमें राजनीतिक एवं वैचारिक स्वीकार्यता के प्रतिमान…

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केरल की बाढ़ एक चेतावनी है, सबक लेना है जरूरी

बांध प्रबंधन का मुद्दा भी बाढ़ के बढ़ते संकट के संदर्भ में बहुत महत्वपूर्ण है। पूर्व में ओडिशा व पश्चिम बंगाल से लेकर पंजाब व गुजरात तक यह बहस का विषय बना है। अब केरल की बाढ़ से भी यह मुद्दा चर्चा के केंद्र में आ गया है। बाढ़ से रक्षा करना व पनबिजली के उत्पादन तथा सिंचाई को अधिकतम करना- इन दो उद्देश्यों में टकराव हो सकता है। केरल में अभूतपूर्व बाढ़ का संकट पैदा होने से देश भर का ध्यान उस पर है। बचाव दलों ने साहस और…

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अभिव्यक्ति की आजादी का नया माध्यम है सोशल मीडिया

अभिव्यक्ति की आजादी का सीधा सवाल प्रेस की स्वतंत्रता से जुड़ा है। जिस मुल्क में वैचारिक आजादी की स्वतंत्रता नहीं है वहां कभी सच्चे लोकतंत्र की स्थापना नहीं की जा सकती है। अभिव्यक्ति की स्वाधीनता न सिर्फ बोलने, लिखने की आजादी देता है बल्कि समता, समातना की स्थापना कर लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा में अहम भूमिका निभाती है। वैश्विक स्तर पर बदलते हालात प्रेस की आजादी पर सवाल खड़े करते हैं। मीडिया संस्थानों में अब निष्पक्ष तौर से काम करना जोखिम भरा हो गया है। हलांकि लोकतांत्रित मूल्यों वाले देश में…

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विकास और भ्रष्टाचार एक-दूसरे के पूरक हैं

crruption and development relation

अब जब विषय छिड़ ही गया है और विद्वान अपने विचार व्यक्त करने पर ही आमादा हैं तो विकास से भ्रष्टाचार के रिश्तों पर भी गंभीर चर्चा कर ली जानी चाहिए। दोनों का आर्थिक संपन्नता से गहन संबंध है। फिर वह चाहे देश का हो या व्यक्ति का। एक विकासशील देश के संदर्भ में तो यह बहुत जरूरी है। हमारा इस मामले में जोरदार इतिहास है। इसलिए इससे एक नई शुरुआत करना तो उचित न होगा। जब से विकास आरंभ हुआ, तब से भ्रष्टाचार आरंभ हुआ है। या शायद उसके…

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