राहुल ने में राफेल की सात अलग-अलग कीमतें बताई : अरुण जेटली

केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने राफेल विमान सौदे को लेकर लगाए गए कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के आरोपों को बेबुनियाद बताया है। न्यूज एजेंसी एएनआई को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि राहुल गांधी विमान की कीमत को लेकर सवाल उठा रहे हैं, लेकिन उन्होंने खुद अपने सात भाषणों में इसकी अलग-अलग कीमतें बताईं। उनके दिए तथ्य गलत हैं। इस पर बात करना प्राइमरी स्कूल की बहस जैसा है।

जेटली ने कहा, ”कांग्रेस के हाथ पहले से ही कई रक्षा सौदा घोटालों से गंदे हैं। उनका मानना है कि अगर उनके हाथ गंदे हैं तो दूसरों को भी बदनाम किया जाए। कांग्रेस को पुराने दाम के बारे में कुछ भी याद नहीं है। वे सवाल उठा रहे हैं कि (राफेल का) 2007 का दाम 500 करोड़ था और भाजपा इसे 1600 करोड़ रुपए में खरीद रही है। वे बेसिक एयरक्राफ्ट की कीमतों की तुलना हथियारों से लैस एयरक्राफ्ट की कीमतों से कर रहे हैं। यूपीए के समय में हुए समझौते के मुताबिक, एयरक्राफ्ट को हथियारों से लैस करने के लिए अलग से भुगतान करना था।”

एनडीए ने पुराने समझौते को बदला : जेटली ने कहा, “हमने 2007 के समझौते को बदलकर नया सौदा किया। इसके मुताबिक, हमने हथियारों से लैस एयरक्राफ्ट का सौदा किया। इसके आधार पर बेसिक एयरक्राफ्ट की कीमत में 9% और हथियारों से लैस एयरक्राफ्ट की कीमत में 20% की कमी हुई है।”

कांग्रेस ने राफेल डील को ठंडे बस्ते में डाले रखा : वित्त मंत्री ने कांग्रेस पर देश की सुरक्षा से समझौता करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा, “कारगिल युद्ध के बाद हमारी फौज को लगा कि उन्हें हथियारों से लैस एयरक्राफ्ट की जरूरत है। हमारे पड़ोसी देशों के पास ये पहले से मौजूद थे। 2003 में वाजपेयी सरकार में इसे खरीदने के लिए मंजूरी मिली। 2004 से 2012 तक यूपीए सरकार ने राफेल को लेकर दो पार्टियों से बात भी की, फिर इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया। राहुल को हमसे सवाल पूछने से पहले जवाब देना चाहिए कि कांग्रेस ने यह डील क्यों रोके रखी।”

राफेल डील भारत-फ्रांस सरकार के बीच, तीसरी पार्टी की भूमिका नहीं : जेटली ने बताया, “ऑफसेट के मामले में डिफेंस सौदे दो प्रकार से होते हैं। राफेल डील सरकार और सरकार के बीच में हुई है। हम उनसे 36 राफेल विमान खरीदेंगे। हम उन्हें पेमेंट देंगे। इसमें तीसरी पार्टी का कोई रोल नहीं है। दूसरा यूपीए सरकार में ऑफसेट पॉलिसी बनी। इसके मुताबिक, जिससे हम खरीदते हैं, उसे 30% तक माल भारतीय सोर्सेज से खरीदना पड़ेगा। इसके पीछे तथ्य है कि इससे हमारी उत्पादन क्षमता और डिफेंस इंडस्ट्री बढ़ेगी। इसे मैं गलत नहीं मानता। लेकिन इसमें विदेशी कंपनी की भूमिका होती है कि वह किससे खरीदना चाहती है। इसमें सरकार का कोई रोल नहीं होता। पॉलिसी के मुताबिक, विदेशी कंपनी निजी या पब्लिक कंपनी से भी खरीद सकती है। यह उनका अधिकार है।”

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